संशयात्मक वृत्ति को मन और निश्चयात्मक वृत्ति को बुद्धि कहते हैं :: स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) : ज्योतिष एवं द्वारका शारदा पीठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज के 68 तम चातुर्मास्य व्रत अनुष्ठान वृंदावन धाम स्थित श्रीउड़िया बाबा आश्रम में आयोजित है जिसमे वेदांत अध्यन में उन्होंने उपस्थित अपने शिष्य प्रतिनिधि दंडी स्वामी सदानंद जी सरस्वती एवं दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी सरस्वती, स्वामी सदाशिवेंद्र जी सरस्वती, ब्रह्मचारी सुबुद्धानन्द जी महाराज, ब्रह्मचारी ब्रह्म विद्यानंद, ब्रह्मचारी रामेश्वरानन्द, ब्रह्मचारी कैवल्यानन्द जी महाराज व आदि संत, महात्माओं एवं भक्तों से कहा कि आकाशादि अपञ्चीकृत पञ्चमहाभूतों के सात़्विक अंश से पांचों ज्ञानेन्द्रियां उत्पन्न होती हैं। उन्ही पांच महाभूतों के पञ्चीकृत अर्थात् सम्मिलित सत्वांश से अन्तःकरण उत्पन्न होता है। वह अन्तःकरण वृत्तिभेद से दो प्रकार के हैं – मन और बुद्धि। संशयात्मक वृत्ति को मन और निश्चयात्मक वृत्ति को बुद्धि कहते हैं।
उन आकाशादि पञ्चमहाभूतों के रजोगुण के अंश से वाणी, हाथ, पैर, गुदा और उपस्थ ये पांच कर्मेन्द्रियां उत्पन्न होती हैं । उन्ही के सम्मिलित रजोगुण के अंश से प्राण उत्पन्न हुआ जो वृत्ति भेद से प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान पांच प्रकार का है। इस प्रकार पांच ज्ञानेन्द्रियां पांच कर्मेन्द्रियां, पांच प्राण, मन और बुद्धि इन सत्रह का समुच्चय सूक्ष्म शरीर है। उसी को लिंग शरीर भी कहते हैं।
उसके उपरान्त उन जीवों के भोग के निमित्त अन्नपानादि भोग्य पदार्थों और भोगायतन स्थूल शरीर की उत्पत्ति के लिए भगवान् उक्त आकाशादि प्रत्येक का पञ्चीकरण करते हैं । उन पञ्चीकृत महाभूतों से ब्रह्माण्ड उत्पन्न होता है। उस ब्रह्माण्ड में चौदह भुवन और उन चौदह भुवनों में भोग्य पदार्थ और भोगायतन (स्थूल शरीर) की उत्पत्ति होती है। अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय – ये पांच कोश हैं। इन कोशों से आवृत्त जीव अपने आत्मा के यथार्थ रूप की विस्मृति के कारण जन्म-मरण रूप संसार को प्राप्त होता है। इन कोशों से तादात्म्य करने के कारण आत्मा भी अपने को वही कोशमय समझता है। जैसे मूंज की परतें हटाते जाने पर उसका सींक निकलता है उसी प्रकार इन कोशों का अभिमान हटा देने पर आत्मा की ब्रह्मरूपता स्पष्ट हो जाती है।