सुविधा के नाम पर आपको घातक रोगों का शिकार बना रहा है आपका मोबाइल

दस वर्षीय वर्तिका स्कूल से आते ही मां का मोबाइल फोन लेकर बैठ जाती है और घंटों उसे छोड़ती नहीं। उसने यू-ट्यूब देखकर डांस, ड्राइंग और काफी कुछ सीख लिया है। पैरेंट्स को गर्व होता है कि इतनी छोटी उम्र में बेटी बहुत-सी चीजें जान गई है। लेकिन इन सबके बीच उन्हें एहसास नहीं रहा कि वर्तिका की आंखों की रोशनी प्रभावित हो रही है। उसे चश्मा लग गया है। बालपन में बड़ों जैसी बातें करनी लगी है। देर रात तक नींद नहीं आती। वर्तिका ही क्या…
आज इस समस्या से 3-4 साल के बच्चे भी अछूते नहीं रहे। मोबाइल व टैबलेट स्क्रीन से हद से ज्यादा चिपके रहने के कारण उनका स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. समीर पारीख की मानें, तो रात में बहुत देर तक मोबाइल स्क्रीन देखने से आंखों की रोशनी तक जा सकती है। स्लीपिंग साइकिल अव्यवस्थित होने से नींद न आने की बीमारी हो सकती है। इन दिनों ड्राई आइज की समस्या भी काफी देखी जा रही है। डॉक्टर्स की मानें तो एक वक्त के बाद आंखें थक जाती हैं, लेकिन लोग फिर भी थकी हुई आंखों से काम लेते रहते हैं। यह बड़ी दिक्कत है। इसमें बच्चों के साथ उनके पैरेंट्स शामिल हैं, जो अक्सर रात में लाइट्स बंद कर चैंटिंग या वीडियो देखते हैं। इस कारण स्क्रीन से निकलने वाली किरणें सीधे आंखों पर पड़ती हैं जिससे वे प्रभावी ढंग से काम करना बंद कर देती हैं। हाल ही में जामा पीडियाट्रिक्स में प्रकाशित शोध के अनुसार, जिस तरह बच्चों को स्मार्टफोन और अन्य डिवाइसेज सीमित समय के लिए ही इस्तेमाल करने चाहिए, उसी तरह पैरंट्स को भी इन पर कम समय बिताना चाहिए।
रेडियो तरंगों से बिगड़ता मानसिक स्वास्थ्य
2015 में अमेरिकन नॉन-प्रॉफिट कॉमन सेंस मीडिया द्वारा कराए गए अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि दुनियाभर में 8 से 12 साल के बीच के बच्चे हर दिन करीब 4 घंटा 36 मिनट स्क्रीन मीडिया के सामने बिताते हैं। वहीं, जर्नल ऑफ अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन में प्रकाशित अध्ययन से पता चला है कि सोशल मीडिया, स्ट्रीमिंग वीडियो, टेक्स्ट मैसेजिंग, संगीत और ऑनलाइन चैटरूम्स सहित डिजिटल माध्यमों के इस्तेमाल से किशोरों का न सिर्फ मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ रहा है, बल्कि उनकी एकाग्रता भी घट रही है। वरिष्ठ न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. प्रवीण गुप्ता बताते हैं कि मोबाइल से निकलने वाली रेडियो तरंगें न केवल दिमाग पर गहरा प्रभाव डालती हैं, बल्कि इससे सुनने की क्षमता भी कम होती है। इससे एडीएचडी जैसे मानसिक विकारों का खतरा भी कई गुना बढ़ जाता है।
विशेषज्ञों की मानें, तो मोबाइल से निकलने वाली इलेक्ट्रो मैग्नेटिक तरंगें शरीर के ऊतकों पर असर डालती हैं। इससे बच्चे-बड़े दोनों ई-मेंशिया यानी इलेक्ट्रॉनिक मेंशिया के शिकार हो रहे हैं। उनमें भूलने की समस्या बढ़ रही है। कई लोगों को बाथरूम में रहते हुए मोबाइल रिंग होने का भ्रम होता है। नेटवर्क न मिलने पर बेचैनी महसूस होने लगती है। पहले रास्ते हमें याद रहते थे, पर अब बिना जीपीएस के रास्तों को याद रखना मुश्किल हो रहा है।
निश्चित समय के लिए फोन का इस्तेमाल
अभी कुछ समय पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने भी मोबाइल के अतिशय इस्तेमाल को एडिक्शन की श्रेणी में रखा है। वहीं, द लैंसेट चाइल्ड ऐंड एडोलेसेंट हेल्थ जर्नल में प्रकाशित शोध में कहा गया है कि बच्चों को प्रतिदिन दो घंटे से अधिक मोबाइल पर नहीं बिताना चाहिए। इसकी बजाय उन्हें अच्छी नींद लेने पर ध्यान देना चाहिए। इससे उनका स्वास्थ्य भी सही रहेगा और पढ़ते समय एकाग्रता रहेगी। आज यह जरूरी हो गया है कि बच्चे-किशोर अपनी प्राथमिकताओं को तय करें।
सोशल साइट्स या स्मार्टफोन पर घंटों वीडियो देखने की बजाय दोस्तों के साथ समय गुजारें। उनके साथ खेलें। बातें करें। रिश्तेदारों, बड़े-बुजुर्गों से मिलें। उनकी बातें सुनें। इससे परिवार के साथ-साथ संस्कांरों से जुड़े मूल्य भी समझ सकेंगे। विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों-किशोरों को एक ऐसा मेंटल फ्रेम बनाना चाहिए, जिसमें मोबाइल यूज करने या न करने या कम यूज करने को लेकर दृढ़ता हो। रोजाना के लिए मोबाइल/सोशल मीडिया यूज करने के लिए समय निर्धारित कर लें। साथ ही, कोशिश करें कि होम स्क्रीन पर काम के ही एप हों। मोबाइल का अलार्म कम से कम यूज करें। जितना संभव हो, फोन को खुद से दूर रखने का प्रयास करें।
खास एहतियात के साथ प्रयोग
वैसे,तो मोबाइल रेडिएशन से बचाव के लिए सरकार ने कुछ गाइडलाइंस तय कर रखी हैं, जैसे-फोन को शरीर से दूर रखना। रात में सोते समय सिर के पास कभी भी फोन न रखना, बात करने के लिए स्पीकर फोन या हेडसेट का इस्तेमाल करना। कॉल की अपेक्षा एसएमएस या चैट को प्राथमिकता देना। कमजोर रेडियो सिग्नल वाले स्थानों से कॉल करने से परहेज करना, क्योंकि वहां ट्रांसमिशन पावर बढ़ जाती है। इसी तरह, जब बाल गीले हों या मेटल फ्रेम का चश्मा पहना हो, तो मोबाइल पर बात करने से परहेज करना चाहिए, क्योंकि मेटल और वॉटर रेडियो तरंगों के गुड कंडक्टर्स होते हैं। यह भी ध्यान रहे कि मोबाइल फोन आपके दिल के पास वाली जेब आदि में न हो। साइबर एक्सपर्ट पवन दुग्गल कहते हैं कि आजकल स्टूडेंट्स कई प्रकार की पाठ्य सामग्री अपने स्मार्टफोन पर ही डाउनलोड करते हैं। कई मामलों में वे शिक्षकों के कहने पर ऐसा करते हैं। लेकिन स्टूडेंट्स को लगातार जागरूक करते रहने की जरूरत है ताकि वे बिना सोचे-समझे कुछ भी डाउनलोड न करें या अनजाने लिंक्स को ओपन न करें। इससे हैकिंग का खतरा भी हो सकता है।
माइंड को करना होगा डी-कंजेस्ट
मोबाइल फोन के अत्यधिक यूज से किशोरों-युवाओं में सिरदर्द की समस्या बढ़ रही है। कानों के आसपास दर्द रहने लगा है। इसके अलावा, अटेंशन में कमी आ रही है। मोबाइल पास न होने पर बेचैनी होने लगती है। काम पर फोकस नहीं रहता। याददाश्त कमजोर होती जा रही है। मेडिकल भाषा में इसे एडीएचडी (अटेंशन डेफिशिएंसी हाइपर एक्टिविटी डिसऑर्डर) कहते हैं। ऐसे में जरूरी है कि किशोर-युवा अपने दिमाग को मोबाइल फोन पर आने वाली अनावश्यक सूचनाओं से डी-कंजेस्ट करें।
डॉ. प्रवीण गुप्ता
निदेशक, डिपार्टमेंट
ऑफ न्यूरोलॉजी
फोर्टिस, गुरुग्राम
स्कूल सिलेबस में करें शामिल
ई-एडिक्शन को आज एक बीमारी के रूप में देखा जाने लगा है। यह एक सामाजिक समस्या बन चुकी है। अभिभावकों से संवाद कम होने के कारण बच्चे साइकोसिस के शिकार हो रहे हैं। वहीं, फ्री रोमिंग, फ्री डाटा, सस्ते स्मार्टफोन की उपलब्धता के कारण बच्चे, किशोर और युवा इंटरनेट के जरिए तमाम प्रकार के वीडियोज देख रहे हैं। इससे नकारात्मक घटनाएं बढ़ी हैं। आज वक्त की मांग है कि स्कूल सिलेबस में स्मार्टफोन के फायदे एवं नुकसान को शामिल किया जाए। अवेयरनेस कैम्पेन चलाई जाए। साथ ही, हफ्ते में एक दिन ई-फास्ट रखा जाए।
प्रेरणा मल्होत्रा
शिक्षाविद एवं
समाजशास्त्री, डीयू
पैरेंट्स-बच्चों की काउंसलिंग जरूरी
स्मार्टफोन की लत से छुटकारा तभी संभव है, जब पैरेंट्स बच्चों के साथ थोड़ी सख्त बरतें। अपने लिए भी कुछ नियम बनाएं। जैसे- एक फिक्स्ड समय ही मोबाइल का इस्तेमाल करेंगे। खाना खाते समय या बातें करते समय स्मार्टफोन नहीं देखेंगे। बच्चों के बात मानने पर उन्हें इनाम देंगे। उन्हें मनोरंजन के अन्य विकल्प उपलब्ध कराएंगे। साथ में एक्सरसाइज या घूमने जाएंगे। इसके साथ-साथ आज बच्चों के अलावा पैरेंट्स को भी काउंसलिंग एवं साइकोथेरेपी की जरूरत है। स्वस्थ व खुश रहने के लिए इसे कतई नजरअंदाज न करें।
आरती आनंद
वरिष्ठ मनोचिकित्सक,
सर गंगाराम अस्पताल, नई दिल्ली