मार्बल की धूल और कचरे से बन सकेगा ब्लॉक्स, टाइल और ईंट

रुड़की। मार्बल उद्योग में दशकों से कचरे (वेस्ट) के निपटान की समस्या बनी हुई थी, लेकिन अब विज्ञान और आधुनिक तकनीक ने इसका एक टिकाऊ समाधान खोज निकाला है। मार्बल खनन और कटाई के दौरान निकलने वाली मार्बल स्लरी (धुल और पानी का मिश्रण) और पत्थरों के टुकड़ों का उपयोग अब उच्च गुणवत्ता वाली ईंटों, ब्लॉक्स और फ्लोरिंग टाइल्स बनाने में किया जा सकेगा।
सीबीआरआई रुड़की के प्रधान वैज्ञानिक राजेश कुमार और डॉ. रजनी लखानी द्वारा इस तकनीक को अपनी टीम के साथ विकसित किया गया है। इसे सीबीआरआई के निदेशक प्रो. प्रदीप कुमार का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। राजेश कुमार ने बताया कि मार्बल पाउडर को सीमेंट और मिट्टी जैसे अन्य पदार्थों के साथ मिलाकर मजबूत, टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल निर्माण सामग्री (जैसे ईंटें, पेवर ब्लॉक, फर्श और दीवार की टाइलें) तैयार की जाती हैं।
इससे कचरा कम होता है और प्राकृतिक संसाधनों की बचत होती है। उन्होंने बताया कि मार्बल स्लरी पर्यावरण के लिए एक बड़ा खतरा रही है। सूखने के बाद यह धूल बनकर हवा में उड़ती है, जिससे श्वसन संबंधी बीमारियां होती हैं और बारिश में यह जमीन की उपजाऊ परत को ढंक कर उसे बंजर बना देती है। इस कचरे को निर्माण सामग्री में बदलकर न केवल प्रदूषण कम होगा, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों जैसे कि मिट्टी और रेत पर निर्भरता भी घटेगी।
उन्होंने बताया कि मार्बल डस्ट में कैल्शियम कार्बोनेट की मात्रा अधिक होती है। जब इसे सीमेंट, फ्लाई ऐश और विशेष बाइंडर्स के साथ एक निश्चित अनुपात में मिलाया जाता है, तो प्राप्त होने वाले ब्लॉक्स पारंपरिक लाल ईंटों की तुलना में अधिक मजबूत और टिकाऊ होते हैं। बताया कि इन ब्लॉक्स की दबाव सहने की क्षमता सामान्य ईंटों से बेहतर पाई गई है।
स्थानीय स्तर पर कचरा उपलब्ध होने के कारण इनके उत्पादन की लागत काफी कम आती है। हाल ही में सीबीआरआई ने इस तकनीक को मेसर्स मार्बल प्लाजा नई दिल्ली को सफलतापूर्वक स्थानांतरित किया है। इस तकनीक के विकास में राजेश कुमार और डॉ. रजनी लखानी के साथ-साथ टीम सदस्य शाहनवाज़ ख़ान, रोहित कुमार, मोहित कुमार का भी योगदान रहा।
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रोजगार के नए अवसर
इस तकनीक के विस्तार से मार्बल बेल्ट वाले क्षेत्रों में लघु उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा। सरकार भी वेस्ट टू वेल्थ अभियान के तहत ऐसे स्टार्टअप्स को प्रोत्साहित कर रही है। इससे न केवल डंपिंग यार्ड्स की समस्या खत्म होगी, बल्कि स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए द्वार भी खुलेंगे।
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राजस्थान के लिए महत्वपूर्ण है उपलब्धि
यह उपलब्धि विशेष रूप से राजस्थान जैसे राज्यों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जहां संगमरमर उद्योग बड़े पैमाने पर कार्यरत है। राजस्थान में प्रतिवर्ष लगभग 13-15 मिलियन मैट्रिक टन मार्बल का उत्पादन होता है। इससे 3,600-3,700 खनन पट्टों से लगभग 6-7 मिलियन मैट्रिक टन ठोस मार्बल अपशिष्ट और बड़ी मात्रा में मार्बल स्लरी उत्पन्न होती है। इस अपशिष्ट के अनुचित निपटान से भूमि, जल और पर्यावरण को गंभीर क्षति पहुंच रही थी। हालांकि राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने मार्बल स्लरी को खतरनाक अपशिष्ट घोषित किया था, लेकिन इसके प्रभावी निपटान के लिए ठोस समाधान उपलब्ध नहीं था। सीबीआरआई की इस नई तकनीक ने इस गंभीर समस्या का व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत किया है।




