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उत्तराखंड में ‘बाबा स्कूल ड्रेस’ बना सियासी और सामाजिक बवाल का केंद्र, देखें वीडियो

 

उत्तराखंड में ‘बाबा स्कूल ड्रेस’ बना सियासी और सामाजिक बवाल का केंद्र

जन केसरी, संवाददाता। उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जनपद के कोटद्वार क्षेत्र में एक छोटी-सी दुकान का नाम अचानक बड़े विवाद की वजह बन गया। मुस्लिम समुदाय से जुड़े एक दुकानदार की “बाबा स्कूल ड्रेस” नामक दुकान को लेकर हिंदू संगठनों के कुछ कार्यकर्ताओं ने आपत्ति जताई और दुकान का नाम बदलने की मांग की। देखते ही देखते यह मामला साम्प्रदायिक तनाव और सामाजिक बहस का रूप ले बैठा।

जानकारी के अनुसार, हिंदू संगठन के कार्यकर्ता दुकान पर पहुंचे और दुकानदार से कहा कि “बाबा” शब्द हिंदू धार्मिक आस्था से जुड़ा है, इसलिए मुस्लिम व्यक्ति को यह नाम नहीं रखना चाहिए। दुकानदार ने स्पष्ट किया कि दुकान का नाम वर्षों से यही है और इसका किसी धर्म से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि यह केवल एक व्यावसायिक नाम है। बावजूद इसके, कार्यकर्ताओं द्वारा दबाव बनाए जाने से माहौल गरमा गया।

इसी दौरान स्थानीय लोग मौके पर एकत्र हो गए। विवाद बढ़ता देख मोहम्मद दीपक नामक युवक दुकानदार के समर्थन में आगे आया। उसने खुले तौर पर कहा कि दुकान का नाम किसी भी धर्म के खिलाफ नहीं है और जबरन नाम बदलवाना गलत है। युवक का यह बयान—“मेरा नाम मोहम्मद दीपक है”—घटना का प्रतीक बन गया, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया।

वीडियो वायरल होने के बाद हिंदू संगठनों के और कार्यकर्ता क्षेत्र में पहुंचे और प्रदर्शन शुरू कर दिया। स्थिति बिगड़ने की आशंका को देखते हुए पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर दोनों पक्षों को शांत कराया और कानून व्यवस्था बनाए रखने की अपील की। फिलहाल पुलिस मामले पर नजर बनाए हुए है और किसी भी तरह की अफवाह या उकसावे से बचने की सलाह दी गई है।

इस घटना ने सोशल मीडिया पर भी तीखी प्रतिक्रियाएं पैदा की हैं। एक वर्ग इसे धार्मिक असहिष्णुता का उदाहरण बता रहा है, जबकि दूसरा वर्ग इसे आस्था से जुड़ा मुद्दा मान रहा है। वहीं, कई लोग मोहम्मद दीपक के साहस को सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे की मिसाल के रूप में देख रहे हैं।

कुल मिलाकर, कोटद्वार की यह घटना एक बार फिर यह सवाल खड़ा करती है कि क्या व्यापारिक नामों को धर्म से जोड़कर देखना सही है, और क्या सामाजिक सौहार्द बनाए रखने की जिम्मेदारी केवल प्रशासन की है या समाज की भी जिम्मेदारी हैं?

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