
नौकरी नंबर वन अखबार की… और तनख्वाह की वसूली सरकारी विभागों से
जन केसरी, देहरादून। रुड़की के एक प्रभारी जी आजकल “कलमवीर” बने हुए हैं। यह महाशय पत्रकारिता से ज्यादा “वसूली उद्योग” के लिए मशहूर हैं। खबरें लिखने से ज्यादा इनकी दिलचस्पी विभागों की हाजिरी लेने में रहती है।
हरिद्वार जिले के रुड़की क्षेत्र के एक छोटे से गांव से निकले ये महाशय खुद को दूसरे राज्य का बताकर और फर्जी किस्सों की ऐसी रामायण सुनाकर वहां के अधिकारियों के इतने करीब जा बैठे कि लोग इन्हें पत्रकार कम और चापलूस ज्यादा समझने लगे। हालत ये कि संगठन में पद भी हथिया लिया, मानो पत्रकारिता नहीं राजनीति की ठेकेदारी हो। चमचागिरी की ऐसी पीएचडी शायद ही किसी विश्वविद्यालय में मिलती हो। सामने अधिकारी दिख जाए तो शब्दों में इतनी मिठास घोलते हैं कि गुड़ भी शुगर फ्री लगने लगे, और पीछे वही अधिकारी इनके फोन देखकर ऐसे कांपते हैं जैसे इनकम टैक्स का नोटिस आ गया हो।
इनकी पत्रकारिता का मॉडल बड़ा आधुनिक है –
“खबर रोको, महीना लो और संबंध मजबूत करो।” हर विभाग के लिए महीने की “वसूली तिथि” तय है। तारीख निकलते ही फोन ऐसे घनघनाते हैं जैसे बैंक लोन की किश्त बकाया हो। अधिकारी भी समझ चुके हैं कि ये अखबार के प्रभारी नहीं, बल्कि विभागीय ईएमआई कलेक्शन एजेंट हैं। एआरटीओ, ऊर्जा निगम और यूपी सिंचाई विभाग को इन्होंने ऐसे पकड़ रखा है जैसे दादा-परदादा की विरासत हो। ऊपर से किसान बनने का शौक अलग। खेत ऐसे लहरा रहे हैं कि असली किसान भी सोच में पड़ जाएं कि खेती करें या पत्रकारिता। गुड़, चावल, गेहूं की बोरियां इनके घर ऐसे पहुंचती हैं जैसे सरकारी राशन योजना का पूरा कोटा इन्हीं के नाम जारी हो। ऊपर से साहब खुद को “स्टार स्टैंडर्ड” का मालिकाना रुतबा रखने वाला बताते हैं। बातों में ऐसा रौब झाड़ते हैं मानो मीडिया जगत के टाटा-बिड़ला हों, लेकिन सच्चाई इतनी “सादगीभरी” है कि खबर छापने के नाम पर लिफाफा लेने में भी शर्म महसूस नहीं होती। कुर्सी पर ऐसा फेविकोल लगाया है कि चाहकर भी कोई हिला नहीं पा रहा। हाल ही में नई गाड़ी, प्लॉट और बढ़ती संपत्तियों ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर पत्रकारिता में “इतनी तेज तरक्की” का कौन सा पैकेज चल रहा है। सबसे बड़ा सवाल “अगर पत्रकारिता यही है, तो फिर दलाली किसे कहेंगे?”




