बिहार

संक्रमण के दौर से स्थायित्व की ओर, दरों को तार्किक बनाने की दिशा में कदम

[आशुतोष त्रिपाठी]। अप्रत्यक्ष करों के मोर्चे पर देश में अब तक के सबसे बड़े कर सुधार वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी को अमल में आए सालभर से कुछ ज्यादा समय बीत गया है। इस दौरान यह नई व्यवस्था कई चरणों और बदलावों के दौर से गुजरी। इस अवधि में कर की दरों में भी कई बदलाव देखने को मिले। जब जीएसटी की नींव पड़ी, तब उसकी सबसे अधिक आलोचना जटिल प्रारूप और कर की ऊंची दरों को लेकर ही की जा रही थी। लेकिन बीते एक साल में गंगा-जमुना में काफी पानी बह चुका है और समय के साथ जीएसटी का स्वरूप भी काफी हद तक बदल चुका है। एक साल पहले चार कर दरों के साथ अस्तित्व में आए जीएसटी में अब तक काफी बदलाव आ चुका है। तब से लेकर अब तक जीएसटी काउंसिल की कुल 28 बैठकें हो चुकी हैं, जिनमें केंद्र समेत सभी राज्य सरकारों का जोर इस पूरी कर प्रणाली को तर्कसंगत बनाने की ओर रहा है।

यह बात समझनी होगी कि जब जीएसटी को लागू किया जा रहा था, तब जीएसटी काउंसिल का ध्यान इस बात पर था कि नई कर प्रणाली से सरकारों के कर राजस्व में कोई गिरावट नहीं आनी चाहिए। लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। जीएसटी से सरकार को होने वाली कमाई में काफी हद तक स्थिरता का रुख देखने को मिल रहा है। ऐसे में अब सभी राज्यों समेत केंद्र सरकार कर अनुपालन को बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रही है। यही वजह है कि बीते दिनों हुई जीएसटी काउंसिल की बैठक में 35 वस्तुओं को 28 फीसद की उच्चतम कर दर की श्रेणी से बाहर कर दिया गया।

सरकार अब कर अनुपालन को लेकर कितनी गंभीर है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जीएसटी को लागू करते वक्त करीब 31 फीसद वस्तुओं को यानी करीब 226 वस्तुओं को 28 प्रतिशत वाली कर श्रेणी के अंतर्गत रखने का प्रस्ताव था, लेकिन जब इसे लागू किया गया, तो इस दायरे में 18 फीसद वस्तुओं को ही रखा गया। कर प्रणाली लागू किए जाने के साढ़े चार महीने के भीतर 177 वस्तुओं को इस श्रेणी से बाहर कर दिया गया और अब तक करीब 191 वस्तुओं को इस कर श्रेणी से बाहर किया जा चुका है।

इस तरह आने वाले दिनों में इस श्रेणी से वस्तुओं को निकालने का क्रम बना रहा, तो जैसी कि वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने उम्मीद जताई है कि आने वाले एक वर्ष में 28 प्रतिशत कर की श्रेणी लगभग खाली रह जाएगी। सरकार का तर्क है कि कर प्रणाली को तर्कसंगत बनाने और कर अनुपालन को बढ़ावा देने के लिए ऐसे उपायों की सख्त जरूरत है। ऐसा इसलिए भी, क्योंकि पिछले एक वर्ष में जीएसटी चोरी के 1,205 मामले सामने आए हैं, जिनमें करीब 3,026 करोड़ रुपये के कर की चोरी की गई थी। ऐसे में उम्मीद है कि अधिकांश वस्तुओं पर कर की दरें कम करने से कारोबारियों को कर चोरी से बचने का प्रोत्साहन मिलेगा।

अलग-अलग नजरिये

बहरहाल अधिकांश वस्तुओं और सेवाओं को कर के अधिकतम दायरे से बाहर कर उन पर कम कर वसूलने की सरकार की रणनीति को देखने के दो नजरिये हैं। पहला नजरिया पूरी तरह आर्थिक हो सकता है, जबकि दूसरा राजनीतिक। चूंकि चुनावी वर्ष की तैयारियां परवान चढ़ने लगी हैं, ऐसे में सरकार के किसी भी फैसले को राजनीति की कसौटी पर कसना तो बनता ही है, क्योंकि अगर देश के चुनावी इतिहास पर नजर डाली जाए, तो यह बात खुलकर सामने आती है कि चुनावी साल में राजनीतिक लाभ के मद्देनजर सरकारें आर्थिक हितों को ताक पर रखने से गुरेज नहीं करती हैं। सबसे पहले इस प्रयास के आर्थिक पहलू पर नजर डालते हैं।

पिछले एक वर्ष के आंकड़े दर्शाते हैं कि शुरुआती कुछ महीनों को छोड़ दिया जाए तो कुल मिलाकर जीएसटी से सरकार को होने वाली कमाई में स्थिरता आई है। चूंकि बड़े पैमाने पर वस्तुओं को कम कर की श्रेणी में लाया गया है, इसलिए अर्थशास्त्र के सामान्य मांगआपूर्ति नियम को ध्यान में रखकर देखा जाए तो सस्ती होने की वजह से इन चीजों की मांग और बिक्री में बढ़ोतरी होगी, जिससे अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी और सरकार को जीएसटी एवं अन्य स्रोतों से मिलने वाले आयकर में इजाफा होने से लाभ होगा। उदाहरण के लिए अगर कोई कारखाना अधिक मात्रा में चीजों का उत्पादन करता है, तो उसे अधिक मात्रा में कच्चे माल की जरूरत होगी, उत्पादन बढ़ाने के लिए अधिक मजदूर चाहिए होंगे, उनके आवागमन के लिए अधिक वाहनों की आवश्यकता होगी। इससे कच्चे माल की बिक्री बढ़ेगी, रोजगार के अवसर सृजित होंगे और सरकार को मिलने वाले कर में बढ़ोतरी होगी।

प्रभावित हो सकती है रेटिंग

इसका एक और पहलू भी है। बड़े पैमाने पर वस्तुओं को उच्च कर की श्रेणी से बाहर लाने के निर्णय का सीधा असर केंद्र और राज्य सरकारों की आय में गिरावट के रूप में देखने को मिल सकता है। वैश्विक रेटिंग एजेंसी मूडीज की मानें तो इस कटौती का सीधा असर सरकार की आय पर पड़ेगा। इसके अलावा मूडीज ने इसे नकारात्मक माना है, क्योंकि सरकार के राजकोषीय सुदृढ़ीकरण के प्रयासों को भी झटका लग सकता है और वह भी तब जबकि सरकार वित्त वर्ष 2018-19 के शुरुआती चार महीनों में ही राजकोषीय घाटे के बजटीय लक्ष्य का तकरीबन 70 फीसदी हिस्सा खर्च कर चुकी है।

मूडीज का अनुमान है कि हाल में की गई करों में कटौती से सरकार को सालाना जीडीपी के 0.04 फीसद से 0.08 फीसदी के बराबर राजस्व का नुकसान उठाना पड़ सकता है। एजेंसी के मुताबिक, भले ही कमाई के नुकसान का अनुपात कम नजर आता हो, लेकिन कर की दरों में बार-बार होने वाले परिवर्तन सरकार की कमाई को लेकर अनिश्चितता पैदा कर सकते हैं। इससे खर्चों को लेकर भी जोखिम स्वाभाविक रूप से बढ़ जाएगा। दरअसल सरकार ने मार्च, 2019 में खत्म होने वाले चालू वित्त वर्ष में कर राजस्व में 16.7 फीसदी की वृद्धि का बजटीय लक्ष्य तय किया है और व्यापक कर आधार और अनुपालन की वजह से सरकार की कमाई बढ़ाने में जीएसटी संग्रह अहम भूमिका निभाएगा।

सरकार को उम्मीद है कि मध्यम अवधि में जीएसटी राजस्व जीडीपी के 1.5 फीसद के बराबर की बढ़ोतरी दर्ज करेगा। जीएसटी को लागू करने में आई शुरुआती दिक्कतों के बावजूद दिसंबर, 2017 के बाद से जीएसटी संग्रह में लगातार सुधार का रुख देखने को मिला है, लेकिन इस कटौती के चलते पूरे वित्त वर्ष में 7.4 लाख करोड़ रुपये कर जुटाने के लक्ष्य के लिए जोखिम पैदा हो सकता है। एक अनुमान के मुताबिक, जीएसटी काउंसिल द्वारा दरों में की गई कटौती की वजह से सरकार को 8,000- 10,000 करोड़ रुपये की कमाई से हाथ धोना पड़ सकता है, लेकिन सरकार को अब भी पूरा भरोसा है कि बेहतर अनुपालन और मांग में आने वाली तेजी केदम पर कमाई में आने वाली इस कमी की भरपाई की जा सकेगी।

राजनीतिक फायदा

एक अन्य पहलू कर की दरों में कटौती का लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंचाना है। उम्मीद है कि सरकार द्वारा मुनाफारोधी नियमों के कड़े अनुपालन की वजह से यह संभव हो सकेगा। तमाम आर्थिक पक्षों पर गौर करते हुए भी चुनावी वर्ष में इस बात को नहीं नकारा जा सकता कि सरकार को दरों में कटौती का राजनीतिक लाभ तभी मिलेगा, जब इस कटौती को सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचाया जाए। जीएसटी लागू करने के दौरान लोगों को शुरुआती तौर पर जो परेशानियां आई थीं, अब इस व्यवस्था में कुछ स्थायित्व आने के बाद सरकार लोगों को राहत देकर उनकी नाराजगी कम करना चाहती है।

राजनीतिक दृष्टिकोण से देखें तो नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक बार फिर सत्ता की बागडोर संभालने का मौका हासिल करने के लिए 8,000-10,000 करोड़ का राजस्व का नुकसान कोई बड़ी कीमत नहीं है और वह भी तब जबकि उसकी भरपाई की पूरी संभावनाएं दिखाई दे रही हैं। अब भले ही सरकार ने यह निर्णय राजनीतिक लाभ को ध्यान में रखकर लिया हो या फिर अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए, आदर्श स्थिति तो यही होगी कि कर की श्रेणियां और कर दरें कम हों, जबकि अनुपालन में सुधार हो। इससे जीएसटी का मूल मकसद हासिल करने में मदद मिलेगी।

जीएसटी को लागू हुए एक साल से अधिक वक्त हो गया है। अपनी शुरुआत से लेकर अब तक यह कानून तमाम बदलावों से गुजरा है, लेकिन अब इसकी अनिश्चितताएं काफी हद तक कम हो गई हैं। यही वजह है कि सरकार अब इसकी दरों को तार्किक बनाने पर जोर दे रही है। हाल में इसके तहत दरें फिर कुछ घटाई गई हैं जिससे राजस्व नुकसान की आशंका तो है, लेकिन सरकार को उम्मीद है कि बेहतर कर अनुपालन और मांग में तेजी से इस घाटे की भरपाई हो जाएगी।

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