यह कितना विचित्र है कि अध्यादेश में “पूजा संपादन स्थल” को भवन माना गया है ::- अविमुक्तेश्वरानंद:

खबरीलाल रिपोर्ट : ज्योतिष एवं द्वारका शारदा पीठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज के शिष्य प्रतिनिधि तथा मंदिर बचाओ आन्दोलनम के नेतृत्त्वकर्ता दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने आज खचाखच भरे मीडिया प्रतिनिधियों की उपस्थिति में कहा कि यह कितना विचित्र है कि अध्यादेश में “पूजा संपादन स्थल” को भवन माना गया है । इससे यह प्रतीत हो रहा है कि पूजा संपादन स्थल को भवन के रूप में परिभाषित कर मठ और मंदिरों के ध्वस्तीकरण को वैध ठहराने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है। ज्ञात हो कि उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा गंगा पाथवे और श्री काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के नाम पर 29 जून 2018 को श्री काशी विश्वनाथ विशिष्ठ क्षेत्र विकास परिषद, वाराणसी अध्यादेश 2018 पारित किया गया था। लेकिन अध्यादेश को पूर्ण पढ़ने के बाद यह समझ आया कि यह धर्म के विकास और उन्नयन के लिए नहीं अपितु उद्योग और पूंजीवाद के विकास के लिए है।
स्वामिश्री: ने आगे कहा कि अध्यादेश में 15 मोहल्लों को समाहित किया गया है परंतु उन 15 मोहल्लों में स्थित मठ-मंदिरों को कहीं भी स्थान नहीं दिया गया है अपितु पूरा का पूरा बॉल उन्होंने अपने ही कोर्ट में रखा है। ये हिंदुत्त्ववादी सरकार , हिन्दू धर्म के पवित्र स्थान – पूजा संपादन स्थल को ही भवन के रूप में परिभाषित कर हिन्दू धर्म पर कुठाराघात किया है। साथ ही उन्होंने अध्यादेश में काशी को तीर्थ की जगह पर्यटन हेतु उन्नयन की बात कही है जब कि अनादि काल से काशी तीर्थ स्थान के रूप में ही समूचे विश्व मे जानी पहचानी जाती है और पर्यटन एक उद्योग है, क्या काशी को तीर्थ के रूप में उन्नयन न कर एक उद्योग के रूप में विकास किया जा रहा है ?
स्वामिश्री: ने अध्यादेश पर कई बड़े सवाल उठाये हैं। उन्होंने कहा – परिषद नीलामी, आवंटन, पट्टा, किराया, लाइसेन्स आदि प्रदान करेगी। परिषद विशिष्ट क्षेत्र में कोई भी व्यापार या व्यवसाय कर सकती है। परिषद जिन्हें उचित समझेगी उसे टैक्स में छूट दे सकती है। परिषद जिस भवन को चाहे उसे अध्यादेश से छूट दे सकती है। परिषद के आदेशों का उल्लंघन करने पर दंड की व्यवस्था है किंतु परिषद के अधिकारियों द्वारा उल्लंघन किये जाने पर कोई दंड की व्यवस्था नहीं है। सबसे महात्त्वपूर्ण, परिषद में धर्म अथवा दर्शनशास्त्र के विशेषज्ञों को कोई स्थान नहीं दिया गया है जबकि प्रकरण धर्म स्थान का है। ये किस प्रकार का अध्यादेश है जो एक पक्षीय दंड की व्यवस्था करता है और तीर्थ, मठ, मन्दिर को कोई स्थान नहीं दिया जाता है ?